पत्रकारिता या चाटुकारिता? मिशन से कमीशन तक का शर्मनाक सफर।

चौथा स्तंभ ढह रहा है: खबरों की मंडी में निष्पक्षता का ‘दिवालियापन’।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का शोरूम? पत्रकारिता के गिरते स्तर का कच्चा चिट्ठा।

आदित्य गुप्ता

अम्बिकापुर – लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी नींव खोता नजर आ रहा है। जिसे कभी ‘मिशन’ माना जाता था, वह अब पूरी तरह से ‘कमीशन’ का खेल बन चुका है। आज की पत्रकारिता उस सब्जी मंडी की तरह हो गई है, जहाँ सच की नहीं, बल्कि उस ‘माल’ की कीमत लगती है जो सत्ता और पूंजीवाद के हितों को साध सके।

पेड मीडिया और मृत आत्माएं

आज न्यूज़ चैनलों के चमचमाते स्टूडियो में चीखते-चिल्लाते एंकरों की आवाज़ों के बीच निष्पक्षता की चीख दब गई है। यह विडंबना ही है कि सत्य को झूठ और झूठ को सत्य साबित करने के लिए बाकायदा ‘प्रोग्राम’ आयोजित किए जाते हैं। पूंजीवाद ने मीडिया संस्थानों को इस कदर जकड़ लिया है कि अब समाचार जनहित से नहीं, बल्कि ‘आर्थिक हितों’ से तय होते हैं। महंगे रहन-सहन और झूठी शोहरत के दलदल में धंसे कुछ पत्रकारों की स्थिति ऐसी है कि वे चाहकर भी इस व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पा रहे। रात को नींद के लिए नशे का सहारा लेना शायद उस ‘चुभन’ को दबाने की कोशिश है, जो सच को गिरवी रखने से पैदा होती है।

मुद्दों से भटकाव: पाकिस्तान के टमाटर बनाम भारत का विकास

आज टीवी स्क्रीन पर जनता के जीवन से जुड़े गंभीर सवालों स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और रोजगार पर चर्चा करने के बजाय पड़ोसी देशों की गरीबी का मज़ाक उड़ाया जाता है। सवाल यह है: हमें पाकिस्तान में टमाटर के भाव से क्या लेना-देना? तुलना किससे होनी चाहिए? अगर तुलना करनी ही है, तो अमेरिका और चीन से कीजिए कि वे तकनीक, शिक्षा और जीवन स्तर में हमसे आगे क्यों हैं। लेकिन नहीं, मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज सत्ता की चाटुकारिता में मशगूल है। जनता का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे मुद्दे परोसे जाते हैं जिनका उनके वास्तविक संघर्षों से कोई वास्ता नहीं है।

क्या निष्पक्षता सिर्फ डिक्शनरी का शब्द है?

आज निष्पक्ष पत्रकार आटे में नमक के बराबर रह गए हैं। व्यवस्था का दबाव और पूंजी का लालच पत्रकारिता की मूल भावना को लील चुका है। यदि पत्रकारिता वाकई जीवित है, तो उसे सत्तासीन सरकार (चाहे कोई भी दल हो) से कड़े सवाल पूछने चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब मीडिया चाटुकारिता छोड़कर ‘जनता का वकील’ बनेगा, न कि सत्ता का ‘प्रवक्ता’। अगर आज भी पाठक और दर्शक नहीं जागे, तो सूचनाओं का यह ‘विकृत बाजार’ हमारे भविष्य को अंधकार में धकेल देगा। समय आ गया है कि हम खबरों की इस ‘सब्जी मंडी’ में ताजे सच और सड़े हुए प्रोपेगेंडा के बीच फर्क करना शुरू करें।

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